शहजादा फारिस की दानाई और नर्मी
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वक्त गुजरता है और बादशाह जाबिर अपनी सख्ती पर नादिम होता है। उसने महसूस किया कि शहजादा फारिस
की कुर्बानी और वफादारी की वजह से वजीर और दीगर अहलकारों की जिंदगी और सल्तनत महफूज रही थी। बादशाह
ने अपने बेटे को वापस बुलाया और सरहद के करीब पहुंचकर उसे खुशामदीद कहा। शहजादा फारिस तख्त
पर बैठा और सल्तनत की जिम्मेदारी संभाली। उसने पहले कदम में इंतजामी उमूर का जायजा लिया। महसूल
की तकसीम, सरहदी दिफा और शहरियों की हिफाजत के लिए कवानीं को मजबूत बनाया। वफादार साथी
को अपनी जान की वफादारी और खिदमत के इतराफ में आला फौजी ओहदे पर मुक्रर किया गया। जबकि दरवेश को शाही
मशीर बनाया गया ताकि हर अहम फैसला उसकी नसीहत और दानाई के मुताबिक लिया जाए। बादशाह जाबिर ने
अपनी गलतियों का इतराफ किया और अमाम से मुआफी मांगी। उसने समझा कि सख्ती और गुस्सा सिर्फ
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