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शहर के बीचों-बीच एक पुरानी इमारत थी, जिसे लोग साया मंज़िल कहते थे।
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कमरा 313 सालों से बंद था। जो वहाँ रुका, वह कभी बाहर नहीं आया।
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रात 2:13 बजे रोने की आवाज़ आती थी। साद को यक़ीन नहीं था।
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अंदर सड़ी हवा और नाख़ूनों के निशान थे। साद का दिल धड़कने लगा।
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शीशे में परछाईं देर से हिली। तभी एक ठंडी सरगोशी गूँजी। तू बहुत देर
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से आया है। अब किसी और को भेजना होगा। सुबह साद गायब था। शीशे पर
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लिखा था, अब मैं बाहर हूँ। अब रात 2:13 बजे साद की
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आवाज़ किसी और को बुलाती है।
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